निमंत्रण

मीरदाद की किताब में एक ख़ास संदेश बहुत ही सुन्दर है. उस संदेश का मूल अकसर में अपनी ज़िन्दगी में अनुभव करता हूँ … मेरा ख्याल है बहुत से और लोग भी ज़रूर करते होँगे. उस संदेश का एक भाव है कि बिना किसी बुलावे या आमंत्रण के कोई कम ही जाना पसंद करते है किसी के घर. अब यह बुलावा जो है वो ज़रूरी नहीं है की एक फोर्मल लैटर भेजा जाये. बहुत बार केवल एक सूक्ष्म इशारा मात्र ही काफी होता है. जिस वक़्त आदम हव्वा के उकसाने पर सेब का आनंद ले रहा था … वास्तव में उसी वक़्त वोह एक निमंत्रण भी लिख रहा था — निमंत्रण उन सब अनुभवोँ को जो अदन से बाहर निकाल दिए जाने के बाद उसकी ज़िन्दगी में आये. इसी विचार को मैं दूसरी ओर से देखना पसंद करता हूँ … जो की मेरे हिसाब से थोडा सकारात्मक है: उस मालिक की मेरी जिंदगी में हमेशा मौजूदगी अगर नहीं अनुभव होती तो इसका मतलब है कि निमंत्रण नहीं भेजा गया है उसे. बंदगी में बैठने पर अगर ख्याल मालिक की बजाये व्यर्थ के शक्लो में जाता है … तो साफ़ है कि निमंत्रण अवश्य ही ग़लत जगहो पर भेजे गए है. मालिक कहाँ से आएगा?